हिंदुस्तान के 10 मराठी डॉन जो मुंबई अंडरवर्ल्ड के भी बाप थे |

B Editor

भारत के कुख्‍यात सरगना और मोस्ट वॉन्टेड तो कई हैं, जैसे कई कश्मीर के आतंकवादी-अलगाववादी, पूर्वोत्तर के उग्रवादी, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा आदि जगहों के नक्सलवादी और माओवादी। अंडरवर्ल्ड के डॉन आदि। लेकिन हम यहां बात करेंगे उन 10 कुख्‍यात सरगनाओं की जिनके कारण भारत को परेशानी झेलना पड़ी। विश्व के हर देश में कुख्‍यात लोग होते हैं। ‘कुख्यात’ अर्थात जो अपनी बुराइयों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन कुख्‍यातों में से कुछ ऐसे रहते हैं जिनको समूचा विश्‍व जानता है। भारत में भी ऐसे ही कुछ कुख्‍यात लोग हुए हैं जिनके कारण भारत ही नहीं, विश्‍व के कई देश परेशान होते रहे हैं लेकिन हर बुरे आदमी का अंत भी बुरा ही होता है। आओ जानते हैं भारत के उन 10 कुख्‍यात लोगों के बारे में जिन्हें ढूंढने में पुलिस के पसीने छुट गए

ठग बहराम : ठग बहराम के कारण अंग्रेज सरकार को ठग विरोधी कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 1790 से 1840 तक उसने 931 हत्याएं कीं। वह अपने शिकार की हत्या उनका गला दबाकर किया करता था। ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ के अनुसार सन् 1790-1840 के बीच महाठग बहराम ने 931 सीरियल किलिंग की, जो कि विश्च रिकॉर्ड है। वर्ष 1840 में उसे अंग्रेज सरकार ने सजा-ए-मौत दे दी।
भूपत सिंह चौहाण :
भूपतसिंह के कहर से जहां राजे-रजवाड़े और अंग्रेज कांपा करते थे, वहीं गरीबों के दिल में उसके लिए सर्वोच्च स्थान था। यही कारण था कि उसे ‘इंडियन रॉबिनहुड’ कहा जाता था जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पाई। भूपत की कई क्रूरताभरी कहानियां हैं तो कई उसकी शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम का गुणगान करती हुई भी हैं।
गुजरात के काठियावाड़ में रहने वाले भूपत सिंह को अंतिम समय तक न तो किसी राजा की सेना पकड़ सकी और न ही ब्रितानी फौजें। अंतत: कई अंग्रेजों को मौत की नींद सुला देने वाले भूपत सिंह के बिना ही अंग्रेजों को वापस इंग्लैंड लौटना पड़ा। अंग्रेजी शासन के अंत के बाद इधर भारत सरकार भी भूपत को कभी पकड़ नहीं सकी।

भूपत सिंह राज्य का धाकड़ खिलाड़ी था। दौड़, घुड़दौड़, गोला फेंक में कोई उसका कोई सानी नहीं था। लेकिन उसकी जिंदगी में ऐसी घटनाएं हुईं कि उसने हथियार उठा लिए। दरअसल, भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते वह खुद इस मामले में फंस गया और उसे काल-कोठरी में डाल दिया गया। बस, यहीं से खिलाड़ी भूपत मर गया और डाकू भूपत पैदा हो गया। भूपत ने जेल से फरार होते ही राजाओं और अंग्रेजों के खिलाफ जंग ही छेड़ दी थी। 1947 की आजादी के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान भूपत और उसके साथियों ने अपने दम पर सैकड़ों महिलाओं की आबरू बचाई।

भूपत सिंह ने सैकड़ों बार पुलिस को चकमा दिया। देश आजाद होने के बाद 1948 में भूपत के कारनामे चरम पर पहुंच गए थे और पुलिस भूपत को रोकने और पकड़ने में पूरी तरह नाकाम हो गई थी। 60 के दशक में डाकू भूपत सिंह अपने तीन खास साथियों के साथ देश छोड़कर गुजरात के सरहदी रास्ते कच्छ से पाकिस्तान जा पहुंचा। कुछ समय बाद उसने वापस भारत आने का इरादा किया, लेकिन भारत-पाक पर मचे घमासान के चलते उसके लिए यह मुमकिन नहीं हुआ।
रंगा और बिल्ला :

रंगा और बिल्ला ने 1978 में 2 बच्चों की नृशंस हत्या कर दी थी। यह कांड देश ही नहीं, विदेश में भी खासा चर्चित हुआ था। यह दौर ही ऐसा था जबकि बच्चों की हत्या करने के मामले में कोई सोच भी नहीं सकता था, जैसे कुछ दिनों पूर्व पाकिस्तान के पेशावर के एक स्कूल में आतंकवादियों ने हमला कर 132 बच्चों की हत्या कर दी थी। आज के दौर में यह सबसे जघन्य और वीभत्स अपराध है।
हालांकि अब देश में कई रंगा और बिल्ला पैदा हो गए हैं, लेकिन रंगा और बिल्ला द्वारा किए गए जघन्य कांड के बारे में आज भी लोगों को मालूम है। रंगा और बिल्ला ने एक सैन्य अधिकारी के बच्चों को अगवा कर दुष्कर्म के बाद उनको मौत के घाट उतार दिया था। केस चलने के बाद दोनों को फांसी दे दी गई।
कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला ने 29 अगस्त 1978 को संजय और गीता चोपड़ा का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया। 3 दिन बाद दोनों भाई-बहनों के शव बरामद किए गए। रंगा-बिल्ला को एक ट्रेन से गिरफ्तार किया गया और 4 साल तक चली सुनवाई के बाद 1982 में उन्हें फांसी दे दी गई। दोनों बच्चों के नाम पर बाद में वीरता पुरस्कार शुरू किया गया, जो हर साल दिया जाता है।

चार्ल्स शोभराज :
चार्ल्स शोभराज को कौन नहीं जानता? दुनिया के सबसे शातिर और खतरनाक सीरियल किलर्स चार्ल्स शोभराज को ‘बिकिनी किलर’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि 1972-1976 के बीच उसने 24 लोगों की हत्या की थी। उसकी चर्चा इसलिए भी की जाती है कि उसने दुनियाभर की पुलिस को खूब चकमा दिया। भेष बदल-बदलकर वह कई देशों का दौरा करता था। हर बार पुलिस के हाथ से बच निकलने के कारण चार्ल्स शोभराज को सर्पेंट (सांप) के नाम से भी जाना जाता था।

वह 1976 से 1997 के बीच भारतीय जेल में रहा। इसके बाद उसे फ्रांस में बंदी बनाया गया। वर्ष 2010 में वह भागकर नेपाल आ गया, जहां कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। फिलहाल वह नेपाली जेल में आराम से रह रहा है।

भारतीय पिता की संतान चार्ल्स शोभराज का वास्तविक नाम हतचंद भाओनानी गुरुमुख चार्ल्स शोभराज है। 1970 के दशक में दक्षिण-पूर्वी एशिया के लगभग सभी देशों में विदेशी पर्यटकों को अपना शिकार बनाने वाला चार्ल्स शोभराज चोरी और ठगी का भी माना हुआ खिलाड़ी है।

आपराधिक गतिविधियों से निवृत्त होने के बाद वह पेरिस चला गया, जहां उसका स्वागत एक सेलेब्रिटी की तरह हुआ। अप्रत्याशित तरीके से नेपाल आने के बाद उसे गिरफ्तार कर कई मुकदमे चलाए गए। 12 अगस्त 2004 को चार्ल्स शोभराज को आजीवन कारावास की सजा दी गई। नेपाली सर्वोच्च न्यायालय ने भी 30 जुलाई 2010 को उसकी इस सजा को बरकरार रखा।

मिस्टर नटवरलाल :
ठगी का पर्यायवाची नाम है ‘मिस्टर नटवरलाल’। नटवरलाल को कोई भी उनके असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव से नहीं जानता। चालाकी और ठगी को ललित कला बना देने वाला यह शख्स अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उस पर बहुत सारी किताबें लिखी गईं और एक फिल्म बनी- ‘मिस्टर नटवरलाल’ जिसमें अमिताभ बच्चन हीरो थे। ‘दो और दो पांच’, ‘हेराफेरी’ और हाल ही है बनी फिल्म ‘राजा नटवरलाल’ जैसी फिल्में भी उसके जीवन से प्रेरित हैं। देश के सारे ठग नटवरलाल का नाम बड़ी इज्जत से लेते हैं।

नटवरलाल की प्रसिद्धि इसलिए भी है कि उसने ताजमहल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को वास्तविक जीवन में बेच दिया था। अमीर लोगों ने उसकी बातों पर यकीन भी कर लिया। खुद नटवरलाल ने एक बार भरी अदालत में कहा था कि ‘सर, अपनी बात करने की स्टाइल ही कुछ ऐसी है कि अगर 10 मिनट आप बात करने दें तो आप वही फैसला देंगे, जो मैं कहूंगा।’

बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में जन्मे नटवरलाल ने बहुत सी ठगी की घटनाओं से बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और दिल्ली की सरकारों को वर्षों परेशान रखा। मिस्टर नटवरलाल पर 52 से अधिक मामले दर्ज थे। दुनिया का बेहद शातिर, चालाक नटवरलाल हमेशा बहुत नाटकीय तरीके से अपराध करता था। वह जिस नाटकीय तरीके से अपराध करता था उससे भी ज्यादा नाटकीय तरीके से पकड़ा जाता था और उसी नाटकीय तरीके से वह फरार होने में भी कामयाब हो जाता था। जैसे लगता था कि इन तीनों ही घटनाओं की स्क्रिप्ट वही लिखता था।

लगभग 75 साल की उम्र में दिल्ली की तिहाड़ जेल से कानपुर के एक मामले में पेशी के लिए उत्तरप्रदेश पुलिस के दो जवान और एक हवलदार उसे लेने आए थे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से लखनऊ मेल में उन्हें बैठना था। स्टेशन पर खासी भीड़ थी। पहरेदार मौजूद थे और नटवरलाल बेंच पर बैठा हाफ रहा था। उसने सिपाही से कहा कि बेटा बाहर से दवाई की गोली ला दो। मेरे पास पैसा नहीं है लेकिन जब रिश्तेदार मिलने आएंगे तो दे दूंगा। अब बेचारे सिपाही को क्या मालूम था कि परिवार और रिश्तेदार उसे लाइक नहीं करते थे। पत्नी की बहुत पहले मौत हो गई थी और उसकी कोई संतान नहीं थी। सिपाही दवाई लेने गया, आखिर दो पहरेदार मौजूद थे। इनमें से एक को नटवरलाल ने पानी लेने के लिए भेज दिया। बचा अकेला हवलदार तो उससे नटवर ने कहा कि भैया तुम वर्दी में हो और मुझे जोर से पेशाब लगी है। तुम रस्सी पकड़े रहोगे तो मुझे जल्दी अंदर जाने देंगे, क्योंकि मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। उस भीड़भाड़ में नटवरलाल ने कब हाथ से रस्सी निकाली, कब भीड़ में शामिल हुआ और कब गायब हो गया, यह किसी को पता नहीं। तीनों पुलिस वाले निलंबित हुए और कहते हैं कि नटवरलाल 60वीं बार फरार हो गया।

चंबल की घाटी :
अपनी ही तरह के इस सामाजिक-भौगोलिक क्षेत्र को कुख्यात बनाने वाली वजहों में से एक सबसे महत्वपूर्ण यहां से बहने वाली चंबल नदी भी है। इंदौर के पास बसे एक शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों में इस नदी का उद्गम स्थल है। इसके बाद राजस्थान के कुछ हिस्सों को पार करते हुए चंबल मध्यप्रदेश के भिंड-मुरैना क्षेत्रों में बहती है, फिर उत्तरप्रदेश के इटावा जिले की तरफ रुख कर लेती है। पानी के कटाव से चंबल के किनारे-किनारे मीलों तक ऊंचे-ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हुई है। ये दशकों से डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं। आजादी के पहले क्रांतिकारियों की मदद करते थे चंबल के डाकू। इन डाकुओं में से कुछ रॉबिनडुड की तरह काम करने थे यानी वे अमीरों को लूटकर सारा पैसा गरीबों में बांट देते थे।

फूलन देवी :
फूलन देवी के जीवन पर एक बहुत ही मशहूर फिल्म बनी है ‘बैंडिट क्वीन’। फूलन देवी से दूर-दूर के गांव के रसूखदार लोग ही नहीं, डाकू भी कांपते थे। महिला डकैत फूलन देवी का जीवन बहुत ही संघर्षमय रहा लेकिन आत्मसमर्पण करने के बाद वह सांसद तक बन गई थीं।

वो कभी गांव की एक आम लड़की हुआ करती थी जिसे केवल अपने परिवार से मतलब था। घर में बाहर से पानी लाना और पूरे परिवार के लिए खाना पकाना, फिर चैन की नींद सोना। बस यही उसका जीवन था। लेकिन अचानक उसके साथ हुई एक घटना ने उसे बंदूक उठाने को विवश कर दिया और चंबल के जंगलों के डाकू ही नहीं, पत्ता-पत्ता उसकी आवाज से कांपने लगा।

दरअसल, गांव के कुछ लोगों ने फूलन देवी के साथ बलात्कार किया था। बलात्कार करने वाले कुल 11 लोग थे। इस घटना के बाद फूलन देवी का जीवन बदल गया। परिवार ने न्याय की मांग के लिए कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन हर तरफ से उसे मायूसी ही हाथ लगी। न्याय नहीं मिलने पर मजबूर हुई फूलन देवी ने बंदूक उठा ली और डाकुओं के गिरोह में शामिल हो गई। एक दिन फूलन अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ गांव में पहुंची और उसके साथ बलात्कार करने वाले 11 लोगों को एक-एक कर लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। वहां उसने कुल 22 लोगों की हत्या की।

वीरप्पन :
बड़ी-बड़ी मुछों वाले चंदन तस्कर वीरप्पन को पकड़ने के चक्कर में कई पुलिस वाले और जवान शहीद हो गए। दक्षिण भारत के कुख्‍यात ‘वीरप्पन’ के नाम से प्रसिद्ध कूज मुनिस्वामी वीरप्पन का जन्म गोपीनाथम नामक गांव में 1952 में एक चरवाहा परिवार में हुआ था। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के जंगलों में था वीरप्पन का राज। तीनों ही राज्यों की पुलिस उसको पकड़ने के लिए अभियान चला रही थी।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और वन अधिकारियों समेत 184 लोगों की हत्या, 200 हाथियों के शिकार, 26 लाख डॉलर के हाथीदांत की तस्करी और 2 करोड़ 20 लाख डॉलर कीमत की 10 हजार टन चंदन की लकड़ी की तस्करी से जुड़े मामलों में पुलिस को वीरप्पन की तलाश थी। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि उसने लगभग 2,000 हाथियों की हत्या की थी।

दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन :
जुर्म की दुनिया के दो दोस्त छोटा राजन और दाऊद इब्राहीम अब दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्‍मन हैं। छोटा राजन ने ‘डी’ गैंग के कम से कम 3 बड़े गुंडों का भारत से बाहर कत्ल करवाया। इनमें दुबई में हुआ सुनील सावंत उर्फ सावत्या का कत्ल, दुबई में ही हुआ शरद शेट्टी का मर्डर और नेपाल में दाऊद के खासमखास मिर्जा दिलशाद बेग का खून प्रमुख है। अंडरवर्ल्ड के 3 और नाम हैं- हाजी मस्तान, अरुण गवली और रवि पुजारी। इसके अलावा प्रारंभिक दौर में वरदराजन मुदलियार (वरदाभाई), भाई ठाकुर, करीम लाला आदि के नाम भी चलते थे। इन सभी पर बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक हरदम फिल्म बनाने के लिए उतावले रहे हैं।

दाऊद इब्राहीम :
अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम प्रारंभ में फिरौती, जालसाजी, धोखाधड़ी, तस्करी, नशे का व्यापार, हफ्ता वसूली के लिए ही कुख्‍यात था, लेकिन 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस होने के बाद उसने बदले की भावना से मुंबई में एक बम हमला करवाकर 257 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस धमाके में 700 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। इसके बाद से ही वह भारत का ‘मोस्ट वॉन्टेड’ बन गया। कहते हैं कि उसको पाकिस्तान भागने में भारत के राजनीतिज्ञों ने ही मदद की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के मामले में दाऊद इब्राहीम, उसके भाई अनीस इब्राहीम और टाइगर मेमन को साजिशकर्ता माना है। फिल्म अभिनेता संजय दत्त को इन धमाकों के दौरान ही अपने पास हथियार रखने के जुर्म में देश के सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल कैद की सजा सुनाई है। संजय इस वक्त पुणे की यरवडा जेल में हैं।

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